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चर्चा में – भारत-आसियान संबंधी मुद्दे : RCEP ‘FTA’ में शामिल नहीं होगा भारत

rcep  in hindi, हाल ही में भारत सरकार ने 16 सदस्य देशों वाले “क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी” (Regional Comprehensive Economic Partnership-RCEP) समूह में शामिल न होने का निर्णय लिया है। निर्णय की घोषणा करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि “RCEP अपने मूल उद्देश्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता एवं इसके परिणाम न तो उचित हैं और न ही संतुलित।”

 गौरतलब है कि RCEP से जुड़ी भारत की चिंताओं को तमाम वार्ताओं के बाद भी दूर नहीं किया जा सका, जिसके कारण भारत को यह निर्णय लेना पड़ा। ध्यातव्य है कि भारत के अतिरिक्त अन्य सभी 15 देश वर्ष 2020 तक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।

दूसरी ओर भारत ने कुछ अनसुलझे मुद्दों के कारण इस समझौते में शामिल न होने का निर्णय लिया है। RCEP वार्ता के दौरान कई भारतीय उद्योग समूहों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि कुछ घरेलू क्षेत्र अन्य देशों के सस्ते विकल्पों के कारण प्रभावित हो सकते हैं, उदाहरण के लिये समझौते के फलस्वरूप देश के डेयरी उद्योग को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार देश के इस्पात और कपड़ा उद्योग को भी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा।

(rcep पर upsc परीक्षा में आने से सम्बंधित लेख)

RCEP Member Countries Map

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क्या है क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी “RCEP” (upsc) ?

RCEP Establishment – इसकी औपचारिक शुरुआत नवंबर 2012 में कंबोडिया में आसियान शिखर सम्मेलन में की गई थी। इस समझौते के बारे में देशों के बीच वार्ता वर्ष 2012 से ही चल रही है परंतु इस पर अभी तक कोई एकमत होकर निर्णय नहीं लिया गया है।

RCEP का पूरा नाम – Regional Comprehensive Economic Partnership

RCEP Member Countries –  10 आसियान देशों (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्याँमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम) और उनके 6 FTA (Free Trade Agreement) भागीदारों- भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बीच प्रस्तावित एक मुक्त व्यापार समझौता है ।

उद्देश्य – व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिये इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार एवं सरल बनाना है।

RCEP की विशेषता :-

  • इन 16 देशों के समूह में दुनिया की आधी आबादी निवास करती है तथा विश्व की कुल जी.डी.पी. में इनकी एक-तिहाई हिस्सेदारी है
  • इन देशों के मध्य आपसी व्यापार दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-चौथाई से भी अधिक है।
  • इसे  ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी के एक विकल्प के रूप में भी देखा जाता है।

RCEP का महत्त्व :-

  •  RCEP की अवधारणा जब क्रियाशील होगी तो लगभग 5 अरब लोगों की आबादी के लिहाज़ से यह सबसे बड़ा व्यापार ब्लॉक बन जाएगा।
  • विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमानतः 40% और वैश्विक व्यापार का 30% प्रभुत्व होगा ।
  • महत्त्वाकांक्षी RCEP का एक अनूठा महत्त्व यह है कि इसमें एशिया की (चीन, भारत और जापान) तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं।
  • आरसीइपी समझौते में वस्तुओं का व्यापार, सेवाओं का व्यापार, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पर्द्धा, विवाद निपटान और अन्य मुद्दे शामिल होंगे।

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भारत क्यों नहीं है तैयार?

  • Regional Comprehensive Economic Partnership की व्यापार संधि में शामिल होने की भारत की अनिच्छा इस अनुभव से प्रेरित है कि भारत पहले से ही RCEP देशों के साथ व्यापार घाटे की स्थिति में है। देश को दक्षिण कोरिया, मलेशिया और जापान जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है। समझौतों का कार्यान्वयन शुरू होने के बाद इन देशों से भारत के आयात में तो वृद्धि हुई लेकिन भारत से निर्यात में उस गति से वृद्धि नहीं हुई, जिससे देश के व्यापार घाटे का विस्तार हुआ। अपने बाज़ार को और अधिक मुक्त बनाने से स्थिति और बिगड़ सकती है।
  • प्रशुल्क (Tariff) उन्मूलन और कटौती को लेकर RCEP के ज़्यादातर सदस्य 92 प्रतिशत वस्तुओं पर शून्य प्रशुल्क (Tariff) लगाने की बात कर रहे हैं, जबकि भारत इसके लिये तैयार नहीं है।भारतकई क्षेत्रों में वे अब भी विकासशील स्थिति में हैं और प्रशुल्क (Tariff) मुक्तप्रतियोगिता उनके हित में नहीं है।
  •  यह समझौता भारत के डिजिटल उद्योग के संरक्षण को भी प्रभावित करेगा। इन देशों से भारत में सस्ते सामानों के आयात से घरेलू उद्योगों पर असर पड़ेगा । इस प्रकार व्यापारिक वस्तुओं के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लिये टैरिफ की समाप्ति को घरेलू उद्योग से प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। एक मंद होती अर्थव्यवस्था ऐसी आशंकाओं को और बल प्रदान करेगी।
  • भारत ने घरेलू उद्योग की सुरक्षा के लिये आयात वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए RCEP में सदस्य देशों को ‘ऑटो-ट्रिगर’ तंत्र अपनाने की सुविधा दिये जाने का प्रस्ताव रखा था।

Auto Trigger तंत्र के अनुसार, यह RCEP के सदस्य देशों के लिये आयात शुल्क में कमी या उसे पूर्णतया समाप्ति की दशा में आयात में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि को रोकने के लिये एक व्यवस्था है। इसके तहत RCEP देशों के बीच होने वाले आयात की मात्रा एक निश्चित सीमा से अधिक पहुँचने पर इस पर संरक्षण शुल्क (Safeguard Duties) स्वत: लागू हो जाएगा। हालांकि इस प्रस्ताव को नहीं माना गया।

  • India द्वारा ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ (Rules of Origin) के नियमों को और भी कठोर करने पर बल दिया गया था । ये ऐसे मापदंड हैं जो किसी उत्पाद के राष्ट्रीय स्रोत को निर्धारित करने के लिये आवश्यक होते हैं । इसके तहत कई मामलों में शुल्क और प्रतिबंध ‘आयात के स्रोत’ पर निर्भर करते हैं।
  • भारत को आशंका है कि RCEP समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारतीय बाज़ार ऐसे तीसरे देश से आयातित सस्ती वस्तुओं से भर जाएगा जो RCEP का सदस्य नहीं है लेकिन उस तीसरे देश ने अन्य RCEP सदस्यों के साथ FTA (Free Trade Agreement) पर हस्ताक्षर कर रखे है। इसपर भी सहमति नहीं बन सकी ।
  • RCEP समझौते में टैरिफ घटाने के लिये वर्ष 2013 को आधार वर्ष के रूप में चुनने का प्रस्ताव किया गया है, परंतु भारत इसके विरोध में रहा है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक जैसे कई उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा है और इसलिये भारत चाहता था कि वर्ष 2019 को आधार वर्ष के रूप में चुना जाए।

[यह लेख rcep upsc in hindi में भारत आसियान सम्बन्ध की जानकारी हेतु महत्वपूर्ण है ]

भारत को क्या फायदा होता RCEP से?(Trade Agreement Benifits)

  • भागीदार देशों की तादाद और दायरे, दोनों ही पैमाने पर, RCEP बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना है। इसके सहयोगी देशों के मध्य मुफ्त व्यापार समझौता होने से उन्हें परस्पर अपने बाजारों को निवेश तथा व्यापार हेतु खुला रखना होगा।
  • भारतीय उद्योग, विशेषकर आई.टी. तथा सेवा क्षेत्र की कंपनियों को नए बाजार की प्राप्ति होगी।
  • इससे रोज़गार के नए अवसरों का सृजन होगा। इससे भारत के वस्तु व्यापार एवं सेवा क्षेत्र में भारत के निर्यात में वृद्धि होगी । जिससे भारत में न केवल पिछले वर्षों से थमी निर्यात गति को सुधारा जा सकता है बल्कि भारत के कुशल एवं अकुशल बेरोजगार वर्ग को भी बड़ी मात्रा मे रोजगार मुहैया कराया जा सकता है ।
  • भारत को आसियान देशों का बाजार मिल सकता है । समझौता होने के बाद चीन, जापान और दक्षिण कोरिया से भारत में आने वाला निवेश भी बढ़ेगा।
  • साथ ही पूर्वोत्तर भारत के जरिए व्यापार में वृद्धि से पूर्वोत्तर के राज्यों के आर्थिक विकास में भी मदद मिलेगा। इसे एक रणनीतिक लाभ के तौर पर देखा जा सकता है।

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RCEP से क्या नुकसान होता ?(Trade Agreement Disadvantage)

  • मौजूदा वक्त में, सेवा क्षेत्र के लिहाज से भारत की स्थिति काफी मजबूत है। लेकिन दिक्कत यह है कि RCEP में वस्तुओं की तुलना में सेवाओं के व्यापार में ज्यादा छूट नहीं है।ऐसे में, भारत को इससे बहुत लाभ की उम्मीद नहीं है।
  • चीनी सामान की ज़्यादा आपूर्ति से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर प्रभावित हो सकता है। चीन के साथ भारत का कुल व्यापार 50 बिलियन डॉलर से भी अधिक का है।दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ भी भारत का व्यापार घाटा बढ़ने की आशंका है। इसमें बौद्धिक संपदा के कड़े नियम शामिल है, इसके चलते भारत का जेनेरिक दवाउद्योग प्रभावित हो सकता है। आयात शुल्क खत्म करने से भारत के कृषि आधारित उद्योगों, वाहन, दवा और स्टील के प्रभावित होने की आशंका है।
  • RCEP के तहत भारत की प्रमुख चिंता ई-कॉमर्स कंपनियाँ तथा उनके निवेश से संबंधित है। इसके अनुसार सरकार किसी निवेशकर्त्ता कंपनी को तकनीकी हस्तांतरण के लिये बाध्य नहीं कर सकती। परिणामत: भारतीय कंपनियाँ वैश्विक बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धा में पीछे छूट जाएंगी। भारत में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियाँ, भारत में उनके शेयर धारकों को उनका लाभांश देने की बजाय अपने मूल देश में धन प्रेषित करेंगी ।
  • चीन तथा अमेरिका के मध्य चल रहे व्यापार युद्ध(trade war) की स्थिति में भारत का इस समझौते में शामिल होना, यह दर्शाएगा कि भारत, चीन के पक्ष में है। हाल ही में भारत द्वारा अमेरिका के साथ किये जाने वाले द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। पहले से ही भारत अमेरिका संबंधो में व्यापार संबंधी मुद्दो पर नाराजगी चल रही है ।

निष्कर्ष:

इस व्यापार व्यवस्था में भविष्य की बड़ी संभावनाएँ विद्यमान हैं । Regional Comprehensive Economic Partnership समझौते का उद्देश्य आसियान सदस्य देशों और आसियान के एफटीए पार्टनर्स के बीच एक आधुनिक, व्यापक, उच्चगुणवत्तापूर्ण और परस्पर लाभकारी आर्थिक साझेदारी समझौता करना है।

भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जुड़ने के इस अवसर का लाभ उठाना चाहिये, जबकि इसके साथ ही विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धा को प्रभावित करने वाले गंभीर मुद्दों को भी संबोधित करना चाहिये। RCEP जैसी साझेदारी से अलग रहना भारत के लिये उचित नहीं है क्योंकि यह भारत को एक बड़े बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा से बाहर कर देगा।

ध्यान देने योग्य है कि RCEP गैर-सदस्य देशों के लिये समान प्रशुल्क आरोपित करने का प्रावधान करता है। यह संभावना व्यक्त की गई है कि RCEP भारत के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन उपर्युक्त विचार को लेकर विवाद बना हुआ है। यदि भारत RCEP में शामिल होता है तो उसको चीन, जापान और कोरिया विनिर्मित सस्ते उत्पादों का सामना करना पड़ेगा। वर्तमान में भारत की सप्लाई चेन मैनेजमेंट में कुशलता की कमी के कारण भारत का घरेलू उत्पाद उपर्युक्त देशों का सामना करने में सक्षम नहीं है।

मेक इन इंडिया को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि सरकार द्वारा कार्यक्रम को अधिक संरक्षण दिया जाए। RCEP जो कि एक मुक्त व्यापार समझौता है, पर इस कार्यक्रम के अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

Ranjeet Singh Anand

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