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पर्यावरण

गंगा कार्य योजना

गंगा कार्य योजना’ के क्रियान्वयन तथा नीतियों व कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिये, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में भारत सरकार ने १९८५ में ‘केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण’ गठित किया था। सीजीए के निर्देशन तथा निगरानी के अधीन परियोजनाओं के कार्यान्वयन हेतु सरकार ने जून, १९८५ में ही पर्यावरण विभाग के घटक के रूप में ‘गंगा परियोजना निदेशालय’ (जी.पी.डी.) का गठन किया। ध्यातव्य है कि १९८५ में स्थापित सी.जी.ए. का कार्य था- गंगा कार्य योजना (जी.ए.पी.-।) के कार्यों के लिए नीतियाँ बनाना। इस योजना के तहत २६१ योजनाएँ बनायी गयी थी।

ज्ञातव्य है कि जी.ए.पी.-१, अभी प्रगति में ही था कि सी.जी.ए. ने फरवरी, १९९१ में  जी.ए.पी.-।। का गठन कर दिया, जिसके अंतर्गत अधोलिखित स्थानों को जल प्रदूषण से मुक्त कराने का लक्ष्य रखा गया-

(अ)         गंगा की सहायक नदियाँ- यमुना, दामोदर तथा गोमती ।

(ब)          चरण-। में छूट गये २५ वर्ग-। कस्बे।

(स)         नदी के किनारे स्थित दूसरे प्रदूषणकारी कस्बे ।

इस प्रकार ३१ मार्च, २००० तक कुल २६१ पारित योजनाओं में २५४ योजनाएँ पूरी की जा चुकी थीं।

उल्लेखनीय है कि सितम्बर १९९५ के केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण (सी.जी.ए.) का नाम बदलकर ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण (एन.आर.सी.ए.) कर दिया गया था और जून १९९४ में ही गंगा परियोजना निदेशालय’ (जी.डी.पी.) का नाम ‘राष्ट्रीय जल संरक्षण निदेशालय’ (एन.आर.सी.डी.) कर दिया गया था।

वर्तमान में गंगा कार्य योजना (जी.ए.पी.-।।) को ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना’ (एन.आर.सी.पी.) के साथ विलय कर दिया गया है।

राष्ट्रीय मानसून मिशन

मई, २०१२ में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पृथ्वी तंत्र संगठन ने ४०० करोड़ रुपये के एक पाँच वषीर्य (२०१२ से २०१७) राष्ट्रीय मानसून मिशन की शुरुआत की, जिसके तहत देशभर में हर समय और हर स्तर पर मानसून के पूर्वानुमान में सुधार लाया जाएगा। मिशन का मुख्य उद्देश्य अधिक अवधि के लिए मौसम के पूर्वानुमान (१५  दिन अथवा पूरे मौसम के लिए) में भारतीय क्षेत्र में मानसून की ग्रीष्मकालीन वर्षा पर जोर देना तथा अल्प से मध्यम अवधि तक के पूर्वानुमान (१० दिनों तक)  के अंतर्गत वर्षा, तापमान, हवा और सर्दी-गर्मी के पूर्वानुमान लगाना है। इस मिशन के अंतर्गत दो उप मिशन होंगे और दो स्तर पर संचालित किए जाएँगे। पहला, विस्तारित क्षेत्र वाला सीजनल टाइम स्केल में तालमेल का पूणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी को और दूसरा, अल्प से औसत क्षेत्र वाला जिसमें तालमेल का काम नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग को सौंपा गया है? ये सेंटर पूर्वानुमान के लिए जरूरी समुद्र संबंधी आँकड़े जुटा कर उपलब्ध कराएँगे। मिशन में दो प्रकार के महासागर के वातावरण संबंधी मॉडल इस्तेमाल किए जाएँगे और साथ ही कपल्क फोरकास्ट सिस्टम वर्जन २.० और यू.के. मौसम दफ्तर द्वारा विकसित यूनीफाइड मॉडल को बेस के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम राष्ट्रीय पर्यावरण पूर्वानुमान केन्द्र द्वारा विकसित किया गया है। मिशनल के जरिए देश-विदेश में सक्रिय अनुसंधान बनाया जाएगा। मिशन के जरिए दक्षिण एशियाई क्षेत्र के महासागरीय प्रेक्षण कार्यक्रमों को सहायता मिलेगी जिससे दक्षिण एशिया में मानसून सम्बंधी बेहतर समझ पैदा होगी। मिशन को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए भारतीय  मौसम विभाग द्वारा दो समितियाँ बनाई गई हैं। साइंटिफिक रिव्यू एण्ड मॉनिटरिंग कमेटी जहाँ देश विदेश के विभिन्न समूहों से प्राप्त अनुसंधान प्रस्ताव की समीक्षा करेगी वहीं साइंटिफिक स्टियरिंग कमेटी इसकी शीर्ष संस्था होगी जो मानसून मिशन का संचालन और मिडकोर्स करेक्शन का काम संभालेगी।

स्वजलधारा कार्यक्रम

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की समस्या के समाधान के लिए केन्द्र सरकार ने स्वजलधारा कार्यक्रम २५ दिसम्बर, २००२ को प्रारंभ किया था। प्रारंभ में आठ राज्यों में यह कार्यक्रम चलाया गया। ग्राम पंचायतों के माध्यम से लागू किए जा रहे इस कार्यक्रम के तहत् गाँववासियों को कुएँ, बावड़ी बनाने व हैण्डपम्प लगाने की सुविधा प्रदान की गई है। योजना लागत के केवल १०’ भाग को ही गाँववासियों को वहन करना होता है तथा शेष ९०’ भाग की भरपाई केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। इस योजना के क्रियान्वयन से देश के सभी ग्रामीण इलाकों में पेयजल की उपलब्धता शीघ्र सुनिश्चित होने की संभावनाएँ व्यक्त की गई है। स्वजल धारा कार्यक्रम के तहत इस घोषणा को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है।

मरूभूमि विकास कार्यक्रम

मरूभूमि को बढऩे से रोकने,मरूभूमि में सुखे के प्रभावों को समाप्त करने, प्रमाणित क्षेत्रों में पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने व इन क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता तथा जल संसाधनों को बढ़ाने के उद्देश्य से मरूस्थल विकास कार्यक्रम चुने हुए क्षेत्रों में १९७७-७८ में प्रारंभ किया गया था। यह कार्यक्रम शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता के आधार पर कार्यान्वित किया जा रहा है। तथापित गर्म शुष्क क्षेत्रों में निधियों का विभाजन केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा ७५:२५ के आधार पर किया जाता है। १ अप्रैल १९९५ से यह कार्यक्रम जलसंभर विकास के लिए तय किए गए साझा दिशा-निर्देशों के तहत् क्रियान्वित किया जा रहा है। १९९५-९६ में गर्म मरूस्थलीय क्षेत्रों में प्रति एक हजार वर्ग कि.मी. क्षेत्र के लिए २७.५० लाख रुपए का आवंटन किया गया, किन्तु किसी भी जिले के लिए अधिकतम आवंटन ८.५० करोड़ रुपए का ही हो सकता था। इसी प्रकार ठण्डे मरुस्थलीय क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश में २ से ३ करोड़ रुपए प्रति जिले तथा जम्मू-कश्मीर में ३ करोड़ रुपए प्रति जिले के आधार पर आवंटन किया गया था। यह कार्यक्रम अब देश के ७ राज्यों के ४.५८ लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल वाले ४० जिलों के २३५ ब्लाकों में चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत खण्डों की पहचान हनुमंत राव समिति द्वारा वर्ष १९९४-९५ में की गई सिफारिशों के आधार पर की गई है। यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने वर्ष २००० में बंजरभूमि संबंधी एटलस (वेस्टलैण्ड एटलस) प्रकाशित किया था तथा मरूभूमि का क्षेत्रफल लगभग १०.५८ मिलियन हेक्टेयर होने का आंकलन किया था। दूसरी ओर वर्ष २००५ में राष्ट्रीय दूरसंवेदी एजेंसी (एनआरएसए) ने बंजरभूमि सम्बंधी एटलस प्रकाशित किया है तथा मरूभूमि के क्षेत्रफल ८.८३ मिलियन हेक्टेयर बताया है। इस प्रकार इन दोनों  क्षेत्रफल में १.७५ मिलियन हेक्टेयर की कमी होने का पता लगा है।

रेगिस्तान में आई इस कमी के कारण हैं- मृदा नमी संरक्षण, जल संसाधन विकास, फसल सुरक्षा, वनीकरण, चारागाह विकास आदि।

हरियाली परियोजना

केन्द्र सरकार की दो हजार करोड़ रुपये की लागत वाली जल संग्रहण से संबंधित विकास योजनाओं को महत्वाकांक्षी बहुआयामी हरियाली परियोजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री ने २७ जनवरी, २००३ को किया था। ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन इस परियोजना को देश की २.३२ लाख पंचायतों के जरिए चलाया जा रहा है। जल संरक्षण के अतिरिक्त और भी अनेक कार्यक्रम इस परियोजना के तहत सम्पन्न किये जा रहे हैं।

परियोजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सौ वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति को वनरक्षक के रूप में नियुक्त कर पंचायत के माध्यम से सौ रुपये प्रतिमाह का पारितोषित उसे प्रदान किया जायेगा। एक माह के पश्चात् इनमें से ७५ या अधिक वृक्ष जीवित रहने पर उस वनकर्मी का पारितोषिक तीन गुना कर दिया जाएगा। ५० से ७५ तक वृक्ष जीवित रहने पर इसे दोगुना किया जायेगा। वन रक्षक यदि ५० या इससे कम पौधों को ही जीवित रख पाने में सफल रहता है तो उसे इस पद से हटा दिया जाएगा।

वृक्षारोपण के लिए जो भूमि वनरक्षक को उपलब्ध कराई जाती है, उस पर वृक्षों के बीच घास लगाने की अनुमति वनरक्षक को दी जाती है। जिसकी बिक्री से अतिरिक्त आय वनरक्षक को उपलब्ध हो जाती है। वृक्षों को सींचने के लिए कुएँ व तालाब खुदवाने की भी उसे अनुमति होती है जिसकी लागत संबंधित ग्राम पंचायत वहन करती है। इस तालाब में मछली पालन की अनुमति भी वनरक्षक को होती है।

हरियाली परियोजना के उद्देश्य निम्न हैं-

१.            जल संग्रहण योजनाओं का क्रियान्वयन

२.            वर्षा जल का संचयन

३.            पेयजल समस्या का निवारण

४.            सिंचाई हेतु जल की व्यवस्था

५.            वृक्षारोपण तथा मत्स्यपालन को प्रोत्साहन

हरियाली परियोजना के लाभ अधोलिखित हैं। यथा-

१.            गाँव अब अधिक आत्मनिर्भर होंगे।

२.            गाँवों का आर्थिक विकास होगा।

३.            ग्रामवासियों को गाँव में रोजगार की प्राप्ति होगी।

वृक्षों की रक्षा हेतु आन्दोलन

पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ से चिपकने का आन्दोलन राजस्थान से आरम्भ हुआ, उत्तर प्रदेश से नहीं। उत्तर प्रदेश में तो बहुत बाद में चिपको आन्दोलन शुरू हुआ फिर दक्षिण भारत में अप्पिको आन्दोलन की शुरुआत हुई ।

चिपको आन्दोलन

इस आन्दोलन के प्रणेता श्री सुन्दरलाल बहुगुणा व श्री चण्डी प्रसाद भट्ट हैं। आन्दोलन की शुरुआत सन् १९७३ में तत्कालीन उत्तरप्रदेश और वर्तमान उत्तराखण्ड के चमोली जिला के गोपेश्वर नामक स्थान से हुई। इसमें आन्दोलनकत्र्ता पेड़ों से चिपक कर उन्हें कटने से बचाते हैं। बाद में इस आन्दोलन का कार्य क्षेत्र और व्यापक हो गया और इसके सूत्र धारों ने समग्र रूप में पर्यावरण की रक्षा का बीड़ा उठाया। श्री सुन्दरलाल बहुगुणा टिहरी बाँध आन्दोलन के भी जनक हैं।

एप्पिको आन्दोलन

एप्पिको आन्दोलन भी अर्थ, संदर्भ और अभिप्राय में चिपको आन्दोलन के ही सदृश है, अन्तर केवल इतना ही है कि चिपको आन्दोलन उत्तर भारत में और एप्पिको आन्दोलन दक्षिण भारत में केन्द्रित है। इसके प्रणेता श्री पांडुरंग हेगड़े हैं। चिपको की शैली यदि पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाना है तो एप्पिको की शैली पेड़ों का आलिंगन है। आन्दोलन का नारा है- ”उलिसु बेलेसु मत्तु बलिसुÓ अर्थात् बचाओ, बढ़ाओ और काम में लाओ। इस आन्दोलन ने भी चिपको आन्दोलन की तरह पेड़ और मनुष्य के जैविक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्तों के साथ आर्थिक रिश्तों पर भी जोर दिया है।

मैत्री आन्दोलन

सन् १९९५ में कल्याण सिंह रावत  ने उत्तरांचल के निर्वनीकृत पहाड़ों को पुन: हरा-भरा करने के लिए ”मैत्री’’ आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन उत्तराँचल की महिलाओं पर आधारित है। उत्तरांचल की क्षेत्रीय भाषा में मैत्री का अर्थ मायका (माँ का घर) है। इस आंदोलन में कुमारी कन्याएँ पौधों की बेरन तैयार करती हैं तथा विवाह की संगठन की हजारों शाखाएँ कार्यशील है। इस संगठन का अपना कोष होता है जिसे वृक्षारोपण पर खर्च किया जाता है। मैत्री संगठन की अध्यक्षा को बड़ी दीदी के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

पश्चिमी घाट बचाओ आन्दोलन

गोवा की पीपुल्स पार्टी द्वारा प्रायोजित पश्चिमी घाट बचाओ आन्दोलन महाराष्ट्र में आरंभ किया गया। इस आन्दोलन ने ‘जंगल बचाओ, मानव बचाओÓ का नारा बुलन्द किया। इस आन्दोलन का मुख्य केन्द्र पश्चिमी घाट है। आन्दोलनकारियों का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार की बेढंगी नीतियों के कारण वहाँ के नासिक और अहमदनगर जिले के साह्याद्रि पर्वतमाला में दूर तक पेड़ न बचने से पहाड़ नंगे दिखाई देते हैं। महाराष्ट्र सरकार के विकास निगम ने पेड़ लगाने के नाम पर युक्लिप्टस और सूबबूल का रोपण किया है जिससे कोई वनोपज नहीं मिलती और ये पेड़ धरती से बहुत अधिक जल सोखते हैं। सार यह है कि अंधा धुंध पेड़ों की कटाई, उत्खनन, बाँध निर्माण आदि क्रिया-कलापों ने जबरदस्त प्राकृतिक असंतुलन पैदा कर दिया है, अत: पश्चिमी घाट के वनों का संवर्धन व संरक्षण आवश्यक है।

ध्यातव्य है कि इस परिप्रेक्ष्य में डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में गणित उच्च स्तरीय कार्यसमूह ने अपनी रिपोर्ट १७ अप्रैल, २०१३ को प्रस्तुत की। कार्यसमूह ने सम्पूर्ण पश्चिमी घाट क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील न मानते हुए इसके प्राकृतिक लैंडस्केप भाग (कुल क्षेत्र का ४१.५६ भाग) के ९० प्रतिशत भाग (कुल क्षेत्र का लगभग ३७ प्रतिशत, जो कि पश्चिमी घाट की सीमा बनाता है) को ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव रखा है। यह लगभग ६०,००० वर्ग कि.मी. क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु राज्यों में विस्तारित है।

उल्लेखनीय है कि पश्चिमी घाट अथवा सहयाद्री का विस्तार पश्चिमी तट के सहारे उत्तर (गुजरात एवं महाराष्ट्र की सीमा) से दक्षिण (कन्याकुमारी) तक है। दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी अनाईमुडी (२,६९५ मी.) इसी में अवस्थित हैं।

सामाजिक वानिकी

ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों-कृषकों एवं कृषि श्रमिकों को चार, भोजन, फल, रेशे एवं जैविक उर्वरकों जैसे पाँच बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय स्तर पर कराए जाने तथा पर्यावरणीय क्षेति को कम से कम करने के उद्देश्य से ग्राम समाज की खाली पड़ी भूमि पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कराए जाने की नीति एवं तत्संबंधित कार्यक्रम को सामाजिक वानिकी की संज्ञा से जाना जाता है। इसके अंतर्गत समाज के सभी लोगों को उनकी खाली पड़ी भूमि पर वृक्षारोपण करने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।

  राष्ट्रीय कृषि आयोग (१९७५) ने सामाजिक वानिकी के अधोलिखित लक्ष्य निर्धारित किये थे-

१.            भूमि संरक्षण एवं मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाना।

२.            फलोत्पादन में वृद्घि द्वारा खाद्य संसाधनों की वृद्घि में योगदान करना।

३.            ईंधन एवं चारा की उपलब्धता में वृद्घि करना।

४.            पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक चेतना बढ़ाना।

५.            इमारती लकड़ी की आपूर्ति करना।

६.            वृहद वृक्षारोपण द्वारा ग्रामीण एवं नगरीय भू-दृश्यों का सौन्दयीकरण।

  सामाजिक वानिकी कार्यक्रम छठी पंचवर्षीय योजना में प्रारंभ किया गया तब से लेकर वर्तमान तक सामाजिक के तीन संघटक तैयार किये गये-

१.            कृषि-वानिकी : इसमें कृषक वन विभाग द्वारा सस्ती दरों पर उपलब्ध कराये गये पौधों को अपने खेतों तथा उनके मेड़ों पर लगाता है।

२.            सार्वजनिक वानिकी : वन विभाग द्वारा तीव्रगति से बढऩे वाले पेड़ों को रोड़, रेल तथा नहरों के किनारे एवं सार्वजनिक क्षेत्रों पर लगाया जाता है, जिसका उद्देश्य समुदाय के लोगों की आवश्यकता की पूर्ति है।

३.            सामुदायिक वानिकी : ग्रामीणों द्वारा ग्राम-समाज की भूमि पर वृक्षों का लगाया जाना।

'एक वन्यजीव गोद लो’ योजना

उड़ीसा स्थित नंदनकानन चिडिय़ाघर में एक अनूठी योजना ‘एक वन्यजीव गोद लो’ मार्च २००८ में शुरू की है, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी पशु या पक्षी का पालनकर्ता बन सकता है। इस योजना को शुरू करने का उद्देश्य चिडिय़ाघर में वन्यजीवों की देखभाल, चिकित्सा, खानपान, आवास आदि को विश्वस्तरीय मानकों के अनुरूप बनाने में सहयोग प्राप्त करना है। इसका उद्देश्य लोगों व कार्पोरेट संस्थानों की चिडिय़ाघर के प्रबंधन में भागीदारी सुनिश्चित करना भी इस योजना के उद्देश्यों में शामिल हैं। योजना के तहत् गोद लिए गए वन्यजीव को अपने साथ घर पर नहीं रखा जा सकता। वन्यजीवों को नंदनकानन जैविक उद्यान में ही रखा जाएगा। चिडिय़ाघर के सूत्रों के अनुसार पालकों द्वारा दिए गए अनुदान को उनके द्वारा पालित वन्यजीवों के पालन-पोषण व देख-रेख पर खर्च किया जाएगा। अनुदान राशि से पालित वन्यजीवों के बाड़ों को बेहतर बनाने का काम भी किया जाएगा। नंदनकानन चिडिय़ाघर में रखे गए सारे पशु-पक्षी इस योजना के तहत गोद लिए जाने के लिए उपयुक्त हैं।

कृषि-वानिकी

एसी भूमि-उपयोग प्रणाली एवं प्रौद्योगिकी जिसमें लाभदायक वृक्षों के साथ-साथ विभिन्न ऋतुओं की फसलें भ उगायी जाती है। कृषि-वानिकी संज्ञा से अभिहित की जाती है।

इस खेती की पद्घति में सभी-फसल प्रबंध (सिंचाई, उर्वरक, खरपतवार एवं कीटव्याधि नियंत्रण) एक साथ किए जा सकते हैं। अलग से पेड़ों के लिए कुछ नहीं करना पड़ता है और उत्पाद के रूप में ईंधन की लकड़ी, हरा चारा, छाया आदि भी उपलब्ध हो जाते हैं। कृषि का जोखिम घट जाता है और भूमि की उपयोगिता बढ़ जाती है।

कृषि-वानिकी के उद्देश्य :

१.            वर्षा का प्रभावी उपयोग करके अधिक से अधिक उत्पादन लेना।

२.            बेकार/बंजर भूमि का वैकल्पिक उपयोग करना।

३.            बेरोजगारों एवं कृषि श्रमिकों को रोजगार के अवसर प्रदान करना।

४.            पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जलवायु को सुव्यवस्थित कर सुधार करना।

कृषि-वानिकी के स्वरूप :

१.            एग्रो-स्लिवी कल्चर (फसलों+ईंधन के पेड़) जैसे- आलू+पोपलर

२.            एग्रो-हार्टीकल्चर (फसलें+फल+वृक्ष) जैसे- मसूर + आँवला

३.            एग्रो-सिल्वी-पास्चुरल (कसलें+पेड़+चारागाह+पशु)

४.            एग्रो-हार्टी-सिल्वी कल्चर (फसलें+फल+ईंधन के पेड़)

५.            सिल्वी-पास्चुरल (पेड़+चारागाह+पशु) प्रणाली

खेती को टिकाऊ बनाने में कृषि-वानिकी अहम भूमिका निभ सकती है जैसाकि अभी हाल के कुछ वर्षों में हुए अनुसंधानों से विदित हुआ है। सघन पद्घतियों के अपनाने से, उचित फसल-चक्र न अपनाने से, अंधाधुंध रसायनों के छिड़काव से, उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग और भूरक्षण आदि से भूमि की उर्वरता घटी है। उर्वरकों का फसल उत्पादन के प्रति प्रभाव घटा है। उपज में स्थिरता आई है। अत: ऐसी परिस्थितियों में कृषि वानिकी ही एक अच्छा विकल्प है, विशेषकर उत्पादन बढ़ाने एवं पर्यावरण संतुलन में। इसलिए निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कृषि-वानिकी अपनाने की अत्यंत आवश्यकता तो है ही अपितु भविष्य में इसकी अच्छी संभावनाएँ भी हैं।

स्कूल नर्सरी योजना

१० अगस्त, २०१५ को केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने के लिए स्कूल नर्सरी योजना की शुरुआत की। इसके तहत बच्चे स्कूलों में क्यारी में बीज बोएँगे एवं पौधे उगाएँगे।

हर घर परियाली योजना

हरियाणा सरकार की इस योजना के तहत आगामी पाँच वर्षों में घरों को हरा-भरा बनाने हेतु रियायती दर पर पौधे उपलब्ध कराए जाएँगे।

भुवन गंगा

‘भुवन गंगा’ एक मोबाइल एप्लीकेशन एवं वेब पोर्टल है; जिसे २३ जून, २०१५ को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती द्वारा लाँच किया। वस्तुत: भुवन गंगा ऐप एंड्रायड आधारित एक सरल मोबाइल एप्लीकेशन है जिसका प्रयोग आम लोगों द्वारा गंगा नदी के जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों से संबंधित सूचना एकत्र कर उसकी जानकारी देने के लिए किया जा सकेगा।

इस ऐप के माध्यम से आम लोग गंगा को प्रदूषित करने वाले स्रोतों की तस्वीरें ‘अपलोड’ कर सकेंगे जिससे संबंधित अधिकारी आगे की कार्रवाई कर सकें।

भुवन गंगा पोर्टल एक विशिष्ट वेब पोर्टल है। इसका प्रयोग ‘गंगा सफाई मिशन’ हेतु निर्णय लेने एवं योजना बनाने में सहायता प्रदान करने वाले उपकरण के रूप में किया जाएगा।

इसे इसरों के भुवन पोर्टल में स्थापित किया गया है।

सफर : वायु गुणवत्ता मौसम पूर्वानुमान प्रणाली

सफर’ प्रथम भारतीय वायु गुणवत्ता एवं मौसम पूर्वानुमान तथा अनुसंधान प्रणाली है जिसका विकास भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के साथ मिलकर किया गया है। इस प्रणाली के एंड्रायड मोबाइल आधारित एप्लीकेशन ‘सफर-एयर’ को १७ फरवरी, २०१५ को राष्ट्र को समर्पित किया गया।

‘सफर-एयर’ एप्लीकेशन से स्थानीय वायु गुणवत्ता संबंधी सूचनाओं के साथ-साथ भावी ३ दिनों की वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान भी प्राप्त किया जा सकता है।

यह मोबाइल एप कलर कोडेड सिस्टम (जिसमें अच्छे से खराब तक ६ वायु गुणवत्ता स्तरों के लिए पृथक रंग निर्धारित हैं) के माध्यम से वायु गुणवत्ता सूचनाएँ उपलब्ध कराएगा।

क्लाइमा अडॉप्ट

भारत उन दक्षिण एशियाई देशों के समूह में हैं, जिसकी अर्थव्यवस्था मूलरूप से कृषि पर निर्भर है। मौसम में हुए छोटे से परिवर्तन भी किसानों की खेती पर विपरीत असर डालती है। हर वर्ष देश का कोई न कोई राज्य सूखा, बाढ़, चक्रवात, मूसलाधार वर्षा, ठण्ड और अन्य मौसमी घटनाओं से प्रभावित होता है। कृषि पर जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव को देखते हुए नार्वे ने २५ करोड़ रुपए की लागत से आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में जलवायु परिवर्तन पर अनुसंधान और अनुकूल परियोजना शुरू की है। क्लाइमाअडॉप्ट नामक इस परियोजना के अंतर्गत अगले चार वर्षों में, जो जून २०१२ से शुरू होकर मई २०१६ तक चली, इन दोनों राज्यों में चयनित किसानों को कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के तीरके सिखाए गए। २५ करोड़ रुपए की यह क्लाइमाअडॉप्ट परियोजना शुरू में तमिलनाडु राज्य के इरोड और गिची जिला में तथा आँध्रप्रदेश के नलगोंडा और गंटूर जिलों में शुरू की गई। आँधप्रदेश में यह परियेाजना वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट ट्रेनिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की देखरेख में काम किया, जबकि तमिलनाडु में इस परियोजना की निगरानी तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने की। इस सहायता परियोजना के अन्य चार भागीदार अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान, एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन, बायोफोस्र्क तथा डब्लूआरओ हैं। इस परियोजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :

१.            कृषि और जल क्षेत्रों पर प्रभाव से निपटने के लिए अंतराल और तैयारियों का ढाँचा तैयार करना।

२.            भविष्य को देखते हुए जलवायु और हाइड्रोलॉजिकल परिदृश्यों को चुनना और लागू करना।

३.            हितधारकों के साथ-साथ महिलाओं और किसानों के क्षेमता निर्माण का प्रयत्न करना।

४.            व्यवस्था के स्तर पर सबसे उपयुक्त अनुकूलन प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना, सम्पन्नता बढ़ाने के लिए तरीके विकसित करने में मदद करेगा।

५.            अनुसंधान, संचार और क्षमता निर्माण के बीच की कड़ी को मजबूत करना।