इच्छा मृत्यु का अधिकार

इच्छा मृत्यु को लेकर हिचकिचाहट और स्पष्टता स्वभाविक है, जिसमें तमाम वैज्ञानिक, नैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक पहलू जुड़े हुए हैं I इसमें दो मुद्दे खासतौर पर उभरते हैं कि क्या किसी को स्वेच्छा से मरने का कानूनी हक दिया जा सकता है, दूसरा यह कि इसके दुरुपयोग की आशंकाओं को कैसे रोका जाए ? कई देशों में यह कानून है और बेल्जियम में कुछ दिन पहले असाध्य बीमारियों से जूझ रहे बच्चे के लिए भी इच्छा मृत्यु को वैध बना दिया गया है I हर समाज में इच्छा मृत्यु को कुछ रूपों में जायज माना जाता रहा है, लेकिन आधुनिक काल में जब नए राज्य तंत्र और समाज व्यवस्थाएं बनी, तो उनमें इसे गैरकानूनी ही माना गया I यह कई मायनों में ठीक भी था, लेकिन 19वीं शताब्दी के अंत में गंभीर रूप से बीमारी और असहाय पीड़ा झेलने वाले लोगों के लिए इसे कानूनी बनाने की मांग फिर सिर उठाने लगी I बीसवीं शताब्दी में कई देशों ने इसे तमाम कानूनी सावधानियों के साथ मान्यता दे दी I भारत में भी इस पर चलने वाली बहस बहुत पुरानी है, इसके पक्ष विपक्ष में कई तर्क हैं ।

भारतीय घटनाओं में इच्छा मृत्यु हासिल करने वाले चरित्रों को विजेताओं की तरह दर्शाया गया है I मृत्यु का वरण करने से ज्यादा उन्होंने मृत्यु को टालकर अपनी वीरता स्थापित की है I कई बार तो इसे दुस्साहस की श्रेणी में रखना ज्यादा उचित प्रतीत होता है I किसी भी समाज की उन्नति अपने लोगों की मृत्यु टालने में निहित होती है, मृत्यु वरण करने में नहीं I आज भी हम विकास को मापने के लिए जिस प्रतिमानकों का चयन करते हैं , उनमें मृत्यु की औसत उम्र भी शामिल है I धर्मभीरु समाज में इसे सर्वशक्तिमान भगवान के खिलाफ मानव का एक अप्रत्यक्ष युद्ध भी कह सकते हैं I बावजूद इसके ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में परिस्थितियों के मारे लोगों के लिए कोई रास्ता ना निकाला हो I सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार देशभर से हजारों लोग काशी करवट लेने बनारस पहुंचते रहे हैं I जब वे गंगा के घाट पर यह सोच कर सो जाते हैं कि रात में गलती से करवट बदलते हुए गंगा में समा जाए, तो इसे भगवान की मर्जी से मौत हासिल होना ही कहा जाएगा I क्या यह इच्छा मृत्यु की सामाजिक और धार्मिक स्वीकृति नहीं है ? पर जब अस्पताल में पड़े मरीज को इच्छा मृत्यु देने की बात आती है, जिसके ठीक होने की कोई उम्मीद बाकी ना हो और जो मौत से भी बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त हो, तो समाज और धर्म के ठेकेदार इसे कथित भगवान की इच्छा के खिलाफ मानते हुए सामने आ जाते हैं I इच्छा मृत्यु को नाजायज मानने वाले दो तरह के लोग हैं I एक वे जो धर्म भीरु है और कथित भगवान की मर्जी के खिलाफ नहीं जाना चाहते I दूसरे वे जो कथित भगवान की मर्जी के खिलाफ अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ रहे हैं और यह उम्मीद रखते हैं कि शायद कभी वह मरीज को ठीक कर पाए कई बार ऐसा करने में वे सफल भी होते हैं I

इच्छा मृत्यु को उचित मानने वालों का सबसे बड़ा तर्क तो यह है कि हर व्यक्ति को सम्मान से जीने और सम्मान से मरने का अधिकार मिलना चाहिए I दूसरा तर्क यह है कि ऐसे समाज में जहां ठीक होने वाले मरीज भी उचित चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ देते हो, वहां लाइलाज मरीजों पर चिकित्सा सुविधाओं का उपयोग कितना उचित कहा जाएगा ? इसमें कोई शक नहीं कि दोनों तर्क वाजिब है, पर इसमें समस्या तब खड़ी हो जाती है, जब यह तय करने की कोशिश करते हैं कि यह फैसला कौन और कब ले सकता है ? इच्छा मृत्यु की मांग करने का अधिकार किसे मिलना चाहिए, यह तय करना आसान नहीं है I परिवार का नाता टूट चुका हो, मित्रों के भरोसे जीने की मजबूरी हो और कोमा में होने के कारण वह स्वयं इच्छा मृत्यु की मांग नहीं कर सकता हो, तो आखिर यह मांग कौन कर सकता है ? संविधान में इसके लिए कोई नियम नहीं बनाए गए हैं I यदि कोई प्रावधान किया गया, तो इस बात की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि उसका दुरुपयोग हो सकता है I

इच्छा मृत्यु की मांग के मामले तो विरले ही आते हैं पर अपने निकट संबंधियों को ठिकाने लगाकर उसकी संपत्ति हड़पने के मामलों से हमारी अदालतें भरी पड़ी है I यदि यह अधिकार चिकित्सक को दिया जाता है, तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि फैसले में कोई खोट ना हो, क्योंकि डॉक्टर भी मिलीभगत से किसी को पागल करार देकर अपना उल्लू सीधा करने के भी ढेरों मामले हैं I ऐसे उदाहरण भी हैं जब डॉक्टर द्वारा लाइलाज घोषित किए गए मरीज ठीक होकर स्वस्थ जीवन जीने लगे I कई बार एक डॉक्टर का इलाज बेकार हो जाने पर किसी दूसरे डॉक्टर से लाभ होने लगता है ? ऐसे में आखिर किस डॉक्टर को यह अधिकार दिया जा सकता है? दिनोंदिन व्यवसायिक होते इस पेशे में डॉक्टरों की साख भी लगातार घट रही है I दूसरी स्थिति उन मरीजों के मामलों की है, जो बीमारी की असहनीय पीड़ा से परेशान होकर अपने लिए इच्छामृत्यु मांगते हैं I इस तरह के मामले में भी यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित मरीज ने अपने पूरे विवेक का इस्तेमाल करते हुए यह मांग की है I कई बार तत्कालिक राहत के लिए भी ऐसी मांग की जा सकती है, जिसका वास्तविकता में कोई अर्थ ना हो I तीसरी स्थिति उन मरीजों की है, जो लाइलाज बीमारी से पीड़ित होने के कारण अपने परिवार को आर्थिक बोझ से बचाने के लिए ऐसी मांग कर सकते हैं I इस तरह के मामले ना सिर्फ पारिवारिक बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं I साथ ही कल्याणकारी राष्ट्र होने का हमारा संवैधानिक संकल्प भी कटघरे में खड़ा हो जाता है I

अब तक सिर्फ 4 यूरोपीय देशों से स्वीटजरलैंड, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और लग्जमबर्ग मैं ही इच्छा मृत्यु को कानूनी अधिकार हासिल है I इन देशों में वैसे लाइलाज मरीजों को, जो बर्दाश्त से बाहर हो रही पीड़ा से मुक्ति चाहते हैं, धीरे-धीरे मौत की दवा देने का कानूनी प्रावधान है I ऐसा करते हुए खास तौर पर इसका ध्यान रखा जाता है कि उनकी मौत से लाभान्वित होने वाले का प्रोत्साहन ना हो I द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2002 में नीदरलैंड्स, इच्छा मृत्यु को कानूनी जामा पहनाने वाला पहला देश बना I पर ऐसा करते हुए वहां इस बात का खास तौर पर ख्याल रखा गया कि मरीज लाइलाज बीमारी और असहनीय दर्द से पीड़ित हो तथा मरीज ने अपने पूरे होशो हवास में इच्छा मृत्यु की मांग की हो I कुछ ऐसे भी देश है , जहां इच्छा मृत्यु को तो गैरकानूनी माना जाता है पर चिकित्सकीय सुविधाओं को हटाकर मरीज को धीरे धीरे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है I अमेरिका में कुछ प्रांतों में घुमा फिरा कर कुछ ऐसे नियम जरूर है , जिससे ऐसे मरीजों को राहत मिले पर सीधे-सीधे इच्छा मृत्यु देना गैरकानूनी है I जर्मनी में ऐसे मामलों में बिना किसी की मदद के मौत देने वाली दवा लेने की छूट दी जाती है I धीरे-धीरे दुनिया में सम्मान से मरने का अधिकार हासिल करने का अभियान जोर पकड़ता जा रहा है और कुछ हद तक सफलता भी मिलती रही है I सभी पहलुओं पर गौर करें, तो भारतीय परिपेक्ष में इस तरह के कानून को लागू करना जटिलताओं को आमंत्रित करना ही है, जहां हम अक्सर कानून के दुरुपयोग के नायाब नमूनों से परिचित होते रहते हैं I यहां के लिए काशी करवट की अवधारणा ज्यादा उचित प्रतीत होती है I फिर भी अरुणा जैसे मामले, जिसमें वह स्वयं काशी करवट भी नहीं ले सकती, निश्चित रूप में हमारे संविधान निर्माताओं को गौर करना चाहिए, जिसमें जीवन मौत से बदतर हो जाता है I

इसके बावजूद ऐसे समाज में इच्छा मृत्यु की बात करना भी गुनाह को हाथ लगाने जैसा है I मुंबई के एक अस्पताल में 42 वर्ष तक कोमा में रहने के बाद जब मौत ने अरुणा शानबाग को मई 2015 में गले लगाया, तो एक बार फिर इस पर बहस शुरू हो गई है की इच्छा मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं I कुछ लोग यह मानते हैं कि अरुणा का मामला इच्छा मृत्यु की मांग को उचित ठहराने का एक सटीक उदाहरण है I नर्स अरुणा शानबाग का एक वार्ड ब्वॉय ने नवंबर 1973 में रेप कर दिया था, जिससे वह कोमा में चली गई थी I उच्चतम न्यायालय ने 2011 में इसके लिए दायर दया मृत्यु की अपील को खारिज कर दिया था, अरुणा को उसके परिजनों ने अपने हाल पर छोड़ दिया था I जब उसे सबसे ज्यादा परिवार की जरूरत थी, तब उसकी मदद करने कोई नहीं आया I उसके साथी नर्सों की सेवा एक मिसाल बनकर सामने आई, जिन्होंने कोमा में पड़ी अरुणा के सुख-दुख का लगातार ख्याल रखा I दूसरी तरफ एडवर्ड ओ बारा के माता-पिता बहन ने भी उसका साथ नहीं छोड़ा I अपने पारिवारिक मूल्यों के निर्वहन के लिए भारत पूरी दुनिया, खासकर पश्चिमी देशों, में आश्चर्यजनक देश माना जाता है, वही ऐसा उदाहरण हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या अरुणा जैसे मरीजों को जिंदा रखने से ज्यादा अच्छा मौत दे देना नहीं होता ?

सुप्रीम कोर्ट के इस दूसरे फैसले में यह माना गया था कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को जायज माना जा सकता है I गंभीर बीमारी और पीड़ा के आधार पर इच्छा मृत्यु दो तरह से हो सकती है – सक्रिय और निष्क्रिय , “सक्रिय इच्छा मृत्यु का अर्थ यह है कि पीड़ा रहित मृत्यु के लिए किसी प्राणघातक इंजेक्शन का इस्तेमाल”, “निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है जिन दवाओं और उपकरणों के सहारे मरीज जिंदा है, उन्हें हटा लिया जाना”, लेकिन इस फैसले में यह माना गया था कि पहले फैसले में भी मंतव्य ही था, जबकि उसमें कोई स्पष्ट राय नहीं दी गई थी I ऐसे में कानूनी और स्पष्टता और उलझन बनी हुई थी , जो अब खत्म हो गई है I

उच्चतम न्यायालय ने कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली पर जीने को मजबूर या मरणासन्न व्यक्तियों के लिए जीवन से मुक्ति का रास्ता खोलते हुए 9 मार्च 2018 को परोक्ष इच्छा मृत्यु तथा जीवन संबंधी वसीयत को कानूनन वैध करा दिया I मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की संविधान पीठ ने सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार को भी मौलिक अधिकार करार दिया I गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर सुनवाई करते हुए संविधान पीठ ने पैसिव यूथेनेशिया की अर्जी या लिविंग विल पर अमल के लिए कुछ जरूरी दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं I न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जीवन रक्षक प्रणाली के सहारे मृत्यु शैया पर लंबे समय से पड़े व्यक्ति पर यदि किसी दवा का कोई असर नहीं हो रहा हो या उसके जीवित रहने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही हो, तो परोक्ष इच्छामृत्यु की अर्जी पर चिकित्सक और परिवार के सदस्य मिलकर निर्णय ले सकते हैं और इसके लिए किसी को भी हत्या का आरोपी नहीं बनाया जाएगा I

संविधान पीठ ने लिविंग विल के संदर्भ में भी स्पष्ट किया है कि सम्मान के साथ मरने का अधिकार व्यक्ति का मौलिक अधिकार है I यदि कोई मरणासन्न व्यक्ति ने पहले से ही लिविंग बिल बना रखा है या कोई पहले से ही लिखित निर्देश दे रखा है, साथ ही उसके ठीक होने की संभावना बिल्कुल क्षीण है, तो इलाज कर रहे चिकित्सक और परिवार के सदस्य मिलकर जीवन रक्षक प्रणाली हटाने का फैसला ले सकते हैं, ताकि व्यक्ति घिसट घिसट कर मरने के बजाय सम्मान से मर सके I शीर्ष अदालत ने कहा है कि नींद बेहोशी की हालत में लंबे समय से बिस्तर पर पड़े, वैसे मरीज, जिन्होंने जीवन संबंधी कोई वसीयत पहले से तैयार नहीं कर रखी है या कोई अग्रिम निर्देश नहीं दिया है, उन्हें भी चिकित्सकों और परिवार के सदस्यों की सहमति से जीवन रक्षक प्रणाली से हटाकर परोक्ष इच्छामृत्यु दी जा सकती है और इसके लिए कोई भी व्यक्ति हत्यारोपी नहीं होगा I संविधान पीठ ने जीवन से परेशान व्यक्ति के जहरीले इंजेक्शन या अन्य किसी तरीके से अपना प्राण त्यागने की इच्छा अर्थात एक्टिव यूथेनेशिया को इस फैसले से अलग रखा है I संविधान पीठ का कहना है कि यह आत्महत्या या सदोष हत्या की श्रेणी में आएगा, जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती I

कॉमन कॉज की ओर से जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने जिरह करते हुए कहा था कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं , जहां टर्मिनेशन ऑफ लाइफ एक्ट मौजूद है और उनका लिविंग विल संबंधी अनुरोध इसके अनुरूप है I केंद्र सरकार ने हालांकि इसका पुरजोर विरोध किया था I संविधान पीठ ने गत वर्ष 11 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था I उल्लेखनीय है कि आम आदमी से जुड़े विभिन्न मूलभूत समस्याओं के लिए वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहे संगठन कॉमन कॉज ने लिविंग विल एंड एटर्नी ऑथराइजेशन से जुड़ा मुद्दा शीर्ष अदालत के समक्ष उठाया था I कॉमन कॉज ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करके फरियाद की थी कि संविधान के अनुच्छेद 21 में सम्मान के साथ जीने के प्रावधानों के तहत सम्मान से मरने का अधिकार भी शामिल किया जाए I इसके लिए व्यक्ति को लिविंग विल का अधिकार दिया जाना चाहिए, ताकि वह घसीट घसीट कर मरने से बच सके I तीन सदस्यीय पीठ ने इच्छा मृत्यु के व्यापक पहलुओं के साथ इसकी व्याख्या का जिम्मा संविधान पीठ के हवाले कर दिया था I

गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने मुंबई के एक अस्पताल में नर्स का काम करने वाली अरुणा शानबाग के मामले में इच्छा मृत्यु पर विचार किया था और अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि विशेष परिस्थितियों में परोक्ष इच्छामृत्यु की इजाजत दी जा सकती है, हालांकि इसके लिए उसने चिकित्सकों की टीम से प्रमाण पत्र हासिल करने की शर्त भी रखी थी, जिसकी रिपोर्ट यह बताती हो कि संबंधित मरीज जीवन रक्षक प्रणाली पर होने के बावजूद शारीरिक और मानसिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं कर रहा है I ऐसी स्थिति में जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर उसकी जीवन लीला समाप्त की जा सकती है, लेकिन अरूणा शानबाग मामले में न्यायालय ने इसकी अनुमति देने से इसलिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उसकी देखभाल करने वाले डॉक्टरों की टीम ने न्यायालय को बताया था कि अरुणा अब भी प्रतिक्रिया कर रही है I न्यायालय ने याचिकाकर्ता पिंकी विरानी को अरुणा का प्रतिनिधि भी मानने से इनकार कर दिया था I न्यायालय का यह इंकार लगभग चार दशक से उसकी देखभाल कर रही नर्सों और डॉक्टरों की टीम के विरोध का परिणाम था I न्यायालय ने कहा था कि इतने लंबे समय से अरुणा की देखभाल करने वाली, हर पल उसके साथ रहने वाली नर्स और चिकित्सक ही उनके परिजन की तरह है, लिविंग दिल एक ऐसा लिखित दस्तावेज है, जिसके तहत एक रोगी अपने मरणासन्न स्थिति के दौरान इलाज के बारे में अग्रिम दिशानिर्देश जारी करता है कि चिकित्सकीय मदद से किसी तरह का लाभ ना होने की स्थिति में उनके परिजन जीवन रक्षक प्रणाली को हटवाने के लिए अधिकृत होंगे I

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