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Cooperative Federalism in Hindi

सहकारी संघवाद!(cooperative federalism in hindi) संघवाद की एक  अवधारणा है जिसमें राष्ट्रीय प्रांतीय एवं स्थानीय सरकारें सामूहिक समस्याओं का समाधान निकालने के लिए एक-दूसरे के साथ मिलकर अन्त:क्रिया करती हैं। यह व्यवस्था उस अवस्था से भिन्न है, जिसमें या तो राष्ट्रीय (संघीय) सरकार ऊपर से कार्यक्रम और योजनाएँ थोंपती है और राज्य सरकारों तथा स्थानीय सरकारों को उनका क्रियान्वयन ठीक उसी प्रकार से करना पड़ता है, जैसा कि केन्द्र प्रायोजित योजना में निर्देशित है; अथवा केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर आपस में कोई तालमेल नहीं होता और प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग नीतियाँ एवं कार्यक्रम बनाए जाते हैं।

               सहकारी संघवाद बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में विकसित एक राजनीतिक एवं संवैधानिक अवधारणा है, जो शासन प्रणाली में संघीय, राज्य एवं स्थानीय निकायों के बीच सरकारी दायित्वों को बराबरी के आधार पर क्रियान्वित किए जाने के बजाय शक्तियों के विकेन्द्रीकरण पर बल देती है। सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का अधिकतम सम्भव फलदायी समाधान खोजने के लिए राष्ट्रीय और राज्य सरकारें एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए कार्य करती हैं। इस व्यवस्था में राष्ट्रीय और राज्य सरकार संवैधानिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी पारस्परिक निर्भरता के वातावरण में इस प्रकार कार्य करते हैं कि कार्यों एवं संसाधनों के मामले में कोई भी व्यक्ति या संस्था निरपेक्ष रूप से शक्तियाँ संचित नहीं कर पाती। इतना ही नहीं सरकार का यह वितरण राज्यों एवं संघ के संस्थानों, विधियों तथा नीतियों को प्रभावित करने के लिए नागरिकों को पहुँच के अनेक बिन्दु उपलब्ध कराता है।(cooperative federalism in hindi)

               यह विचार सर्वप्रथम १९३० के दशक के प्रारंभ में संयुक्त राज्य अमरीका में ‘न्यू डील’ काल में प्रारंभ किया गया इसके परिणामस्वरूप वहाँ द्वैत संघवाद के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमरीका की संघीय सरकार को राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्तियाँ ही प्राप्त थीं। राज्य अपने राजनीतिक क्षेत्र में उतने ही शक्तिशाली थे, जितना कि संघीय सरकार थी। किसी भी स्तर पर संघीय अथवा राज्य सरकारों की शक्तियाँ अतिच्छादन नहीं करती थीं।

               ‘न्यू डील’ काल में संघीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने के लिए राज्यों को दिया जाने वाला अनुदान सहकारी संघवाद का सर्वोत्तम उदाहरण माना गया। किसी कार्यक्रम को ऊपर से थोपने के बजाय संघीय सरकार ने इसी कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के लिए राज्य सरकारों को महत्त्वपूर्ण तरीके से वित्तीय संसाधन मुहैया कराए। संयुक्त राज्य अमरीका के स्वास्थ्य एवं मानव सेवाएँ विभाग द्वारा सन् १९३५ में प्रारंभ किया गया ‘आश्रित बच्चों वाले परिवारों को सहायता’ नामक कार्यक्रम सहकारी संघवाद का ही उदाहरण था।

भारत में सहकारी संघवाद((cooperative federalism in India)

               भारत की अद्वेत-संघवाद की संज्ञा दी जाती हैं, क्योंकि भारतीय संविधान में भारत को एक संघ के रूप में निरूपित नहीं किया गया है। अनुच्छेद-१ में भारत को ‘राज्यों को संघ’ कहा गया है, जिसे विघटित नहीं किया जा सकता भारत का कोई भी राज्य संघ से पृथक् नहीं हो सकता। इसके बावजूद भारत में संघीय सरकार की कुछ विशेषताएँ पाई जाती हैं-

१.            एकल नागरिकता।

२.            एकल संविधान।

३.            राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति संघीय सरकार द्वारा।

४.            राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति

               संघीय सरकार के पास

५.            राज्य अपनी स्वयं की सेना नहीं रख सकते।

६.            राज्य विदेशी सरकारों से स्वतंत्र रूप से राजनयिक सम्बंध नहीं बना सकते।

७.            भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) तथा भारतीय वन सेवा

               (आईएफएस) जैसी केन्द्रीय सेवाएँ।

८.            राज्यों के परिषद्- राज्य सभा में राज्यों को बराबरी के आधार पर प्रतिनिधित्व नहीं।

९.            राज्य विदेशी सरकारों/अंतर्राष्ट्रीय सरकारों से केन्द्र की अनुमति के बिना ऋण नहीं ले सकते।

१०.          एकल न्यायिक प्रणाली

११.          राजस्व जुटाने की अवक्षेपित शक्तियाँ संघीय सरकार के पास।

लेकिन इन सबके बावजूद भारतीय शासन प्रणाली के निम्नलिखित अभिलक्षण उसे संघीय शासन

प्रणाली वाला देश बनाते हैं।

१.            भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की संघीय सूची तथा राज्य सूची में संघीय सरकार और राज्य                         सरकार के अधिकार तथा शक्तियाँ पूरी तरह से अलग-अलग हैं।

२.            संघीय एवं प्रांतीय स्तर पर विधायिकाएँ तथा कार्यपालिकाएँ पृथक्-पृथक् हैं।

३.            संविधान की सर्वोच्चता।

४.            न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति।

               स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के पहले दो दशकों (१९४७ से १९६७) तक केन्द्र एवं राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं (१९५९ में केरल में वामपंथी दलों की सरकार को आपवादिक रूप से छोड़कर) उस अवस्था में केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच किसी भी स्तर पर मत-भिन्नता की स्थिति नहीं थी अर्थात् परोक्ष रूप से सहकारी संघवाद की स्थिति थीं।

               १९६७ के आम चुनावों में पंजाब, बिहार, उत्तरप्रदेश, प. बंगाल, केरल, ओडिशा तथा मध्यप्रदेश में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक दलों संयुक्त विधायक दल (संविद-संयुक्त विधायक दल) की मिली-जुली सरकारें बनाईं। उसी के बाद से भारत में राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार के बीच संघर्ष का दौर शुरू हुआ। राज्यों में कतिपय क्षेत्रीय दल : जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और प्युपिलस डेमोक्रेटिक पाटी, पंजाब में अकाली दल, हरियाणा में लोकदल, उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी, बिहार में जनता दल एवं राष्ट्रीय जनता दल, प. बंगाल में मार्क्सवादी पार्टी, ओडिशा में बीजू जनता दल, आंध्रप्रदेश में तेलगूदेशम पार्टी, महाराष्ट्र में शिव सेना, तमिलनाडु में डीएमके तथा अन्नाद्रमुक तथा केरल में वामपंथी मोर्चा। इन राज्यों की कांग्रेस विरोधी सरकारों ने अधिक स्वायत्तता की माँग की।

               १९९० के बाद से केन्द्र सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों की भूमिका में वृद्घि हो जाने से सहकारी संघवाद का ‘अस्पष्ट’ सा स्वरूप सामने आया। सरकार में भागीदार क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने-अपने राज्य के लिए अपेक्षाकृत अधिक संसाधन जुटाने में सफल रहे।

cooperative federalism in hindi

भारतीय संविधान में सहकारी संघवाद(cooperative federalism in Indian constitution) की जड़ें

               यद्यपि भारतीय संविधान में किसी भी स्तर पर ‘सहकारी संघवाद’ शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन केन्द्र एवं राज्यों के बीच बेहतर समन्वयन एवं सहयोग के लिए निम्नलिखित प्रावधान समाहित है-

१.            अंतर्राज्यीय परिषद्- भारतीय संविधान के अनुच्छेद २६३ में अंतर्राज्यीय परिषद् गठित किए जाने का उल्लेख हैं : ”यदि किसी समय राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि ऐसी परिषद् की स्थापना से लोकहित की सिद्धि होगी जिसे-

(अ)         राज्यों के बीच, जो विवाद उत्पन्न हो गए हों, उनकी जाँच करने और उन पर सलाह देने।

(ब)          कुछ या सभी राज्यों के अथवा संघ और एक या अधिक राज्यों के सामान्य हित से संबंधित विषयों के                         अन्वेषण और उन पर विचार-विमर्श करने, या

(स)         ऐसे किसी विषय पर सिफारिश करने और विशिष्टतया उस विषय के सम्बंध में नीति और कार्यवाही के                      अधिक अच्छे समन्वय के लिए सिफारिश करने।

               के कर्तव्य का भार सौंपा जाए, तो राष्ट्रपति के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह आदेश द्वारा ऐसी परिषद् की स्थापना करे और उसे परिषद् द्वारा किए जाने वाले कर्तव्यों की प्रकृति को तथा उसके संगठन और प्रक्रिया को सुनिश्चित करें।”

               अंतर्राष्ट्रीय परिषद् का गठन सर्वप्रथम २७ दिसम्बर, १९९० को राष्ट्रपति द्वारा जारी एक आदेश से किया गया। इसे १९ मई, १९९० तथा २४ दिसम्बर, १९९६ को संशोधित किया गया। इसका संगठन निम्नलिखित प्रकार हैं-

अध्यक्ष : प्रधानमंत्री

सदस्य :

अ.          सभी राज्यों के मुख्यमंत्री (यदि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हैं, तो उस राज्य के राज्यपाल)

ब.           विधान सभाओं वाले केन्द्रशासित क्षेत्रों के मुख्यमंत्री।

स.           गैर-विधान सभाओं वाले केन्द्रशासित क्षेत्रों के प्रशासक।

द.           संघीय मंत्रिमण्डल के ६ कैबिनेट मंत्री (प्रधानमंत्री द्वारा नामित)

               (केन्द्र सरकार के अन्य मंत्रियों तथा स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य-मंत्रियों को इस स्थिति में आमंत्रित किया जा सकता है, जब उनके द्वारा देखे जा रहे विषय से सबंधित किसी मद पर विचार किया जा रहा है।

२.           क्षेत्रयि परिषदें : राज्य पुनर्गठन अधिनियम, १९५६ के तहत देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में स्थिति राज्यों के बीच अंतर-सरकारी विचार-विमर्श एवं सहयोग को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय परिषदें गठित किए जाने का प्रावधान है।

               गठित की गई क्षेत्रीय (जोनल) परिषदें निम्नलिखित प्रकार हैं-

               उत्तरी जोनल काउंसिल- हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, चण्डीगढ़

               केन्द्रीय जोनल काउंसिल- छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश

               पूर्वी जोनल काउंसिल- बिहार, झारखण्ड, महाराष्ट्र, दमन एवं दीव, दादरा नागर हवेली, राजस्थान

               दक्षिण जोनल काउंसिल- आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पुदुचेरी।

               भारत के राष्ट्रपति द्वारा केन्द्रय गृहमंत्री को सभी जोनल परिषदों का अध्यक्ष मनोनीत किया गया हैं। चक्रानुक्रम में परिषदों के राज्यों के मुख्यमंत्री इसके उपाध्यक्ष हैं जिनका कार्यकाल एक वर्ष का हैं। प्रत्येक केन्द्र शासित क्षेत्र के दो-दो प्रतिनिधि भी इन परिषदों में नामित किए जाते हैं। इसके साथ-साथ नीति आयोग द्वारा प्रत्येक परिषद् में एक-एक सदस्य, प्रत्येक राज्य के मुख्य सचिव प्रत्येक राज्य के विकास आयुक्त भी इन परिषदों में सलाहकारों के रूप में शामिल किए जाते हैं।

३.           राष्ट्रीय विकास परिषद्- भारत में योजना आधारित विकास मॉडल को अपनाया गया। १५ मार्च, १९५० को योजना आयोग का गठन किया गया, जो एक गैर-सांविधिक निकाय था। योजनाएँ बनाने का कार्य इसी निकाय को दिया गया। लेकिन पंचवर्षीय योजना के अंतिम प्रारूप को अनुमोदित करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय विकास परिषद् की स्थापना ६ अगस्त, १९५२ में की गई। सभी संघीय कैबिनेटस्तरीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, केन्द्रशासित क्षेत्रों के प्रतिनिधि, योजना आयोग के सदस्य इस निकाय के सदस्य होते थे। नीति आयोग के गठन के साथ ही इस निकाय को भी समाप्त कर दिया गया है।

४.           नीति आयोग- (नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेशन इंडिया) : केन्द्रीय मंत्रि मण्डल द्वारा लिए गए एक ऐतिहासिक और बड़े निर्णय के तहत् योजना आयोग को समाप्त करके १ जनवरी, २०१५ से नीति आयोग का गठन किया गया है। नीति आयोग को सहकारी संघवाद का संवाहक माना जाता है। इसकी गवर्निंग काउंसिल का संगठन निम्नलिखित प्रकार हैं-

अध्यक्ष : भारत के प्रधानमंत्री

सदस्य : नीति आयोग के उपाध्यक्ष, सभी पूर्णकालिक सदस्य, सभी पदेन सदस्य, सभी राज्यों, केन्द्रशासित क्षेत्रों के मुख्यमंत्री, अन्य केन्द्र शासित क्षेत्रों के उपराज्यपाल एवं उप-समूह गठित किए गए हैं-

अ.         मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के संयोजकत्व में केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के औचित्य पर उपसमूह।

ब.          पंजाब के मुख्यमंत्री के संयोजकत्व में कौशल विकास पर उप-समूह।

स.         आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के संयोजकत्व में स्वच्छ भारत अभियान पर उप-समूह

५.          चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशें- भारतीय रिजर्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में गठित चौदहवें वित्त आयोग की निम्नलिखित सिफारिशें भारतीय शासन प्रणाली को सहकारी संघवाद की ओर ले जाती हैं-

अ.         केन्द्र सरकार के विभाजकीय कर राजस्व का ४२ प्रतिशत राज्यों को।

ब.          राज्य एवं केन्द्र विकास में बराबरी के साझीदार हैं।

स.         केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को अनुदान दिए जाने की परम्परा का अन्त।

द.          योजना के क्रियान्वयन में राज्यों को अधिक वित्तीय दायित्व।

इ.          पंचायती राज संस्थाओं तथा स्थानीय नगर निकायों को अधिक संसाधन/पंचायती राज संस्थाओं को कुल अनुदान का ९०’ बुनियादी तथा १०’ उपलब्धियाँ के आधार पर जबकि स्थानीय नगर निकायों को यह आवंटन ८०:२० के अनुपात में।

[ cooperative federalism in hindi upsc की परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण लेख है ] 

सहकारी संघवाद (cooperative federalism) : व्यवहार में

               सैद्धांतिक रूप से सहकारी संघवाद की वकालत प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों के अभिभाषणों में की जाती रही है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने से इस अवधारणा को नया आयाम मिला है। योजना आयोग जैसी संस्थाओं ने जहाँ आर्थिक मोर्चे पर सहकारी संघवाद का गला घोंटा है, वहीं भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची पर केन्द्र के लगभग एकाधिकार ने राज्यों को राजस्व सृजन के नवीन स्रोतों के सृजन के रास्ते ही बन्द कर दिए हैं। कांग्रेस के शासनकाल में शामिल करो (राजस्व के स्रोतों) से इतर अवक्षेपित स्रोतों के सृजन का अधिकार माँगते रहे हैं। वर्तमान में यह स्थिति है कि यदि कोई कर संघीय सूची एवं राज्य सूची दोनों में से किसी में भी नहीं है, तो केन्द्र सरकार उसे लागू कर देती है, जैसकि सेवाओं पर कर।

               राजनीतिक स्तर पर राज्य सरकारें समय-समय पर संघीय सरकार के कोपभाजन का शिकार होती रही हैं। २०१६ में अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से ही राज्य सरकारें बहाल हो सकीं केन्द्र में सरकार बदलने पर राज्यपालों की बर्खास्तगी में सहकारी संघवाद की भावना के प्रतिकूल है।

               सहकारी संघवाद को सुदृढ़ किए जाने हेतु निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए-

अ.          समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने के मामले में राज्यों एवं केन्द्र के बीच एक व्यापक सहमति।

ब.           राज्यों के राज्यपालों द्वारा राष्ट्रपति के अनुमोदन हेतु आरक्षित राज्यों के विधायकों का निस्तारण ६ माह

               के भीतर हो जाना चाहिए।

स.           अंतर्राष्ट्रीय संधियों में राज्यों, विशेषकर सीमावर्ती राज्यों की सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका होनी चाहिए।

द.           संयुक्त राज्य अमरीका की तरह राज्य सभा में प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

इ.           अंतर्राज्यीय परिषद् एवं जोनल परिषदों की नियमित बैठकें होनी चाहिए।

फ.          अखिल भारतीय सेवाओं का विस्तार करके उनमें स्वास्थ्य, न्यायिक, शिक्षा आदि क्षेत्रों की सेवाओं को भी

              शामिल किया जाना चाहिए।

ज.          राज्यपालों की नियुक्ति राजनीतिक निष्ठा के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। इनका कार्यकाल निश्चित                  होना चाहिए तथा इन्हें पदच्युत करने का तरीका वही होना चाहिए, जो राष्ट्रपति के लिए हैं।

च.          राज्यपाल का पद सत्ताधारी दल के चुनाव में पराजित नेताओं को उपकृत करने के लिए नहीं किया जाना

              चाहिए।

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