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भारत , राज्यों का एक संघ है। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रावधान तय किए गए हैं। इस लेख में  संविधान के भाग 11 केंद्र व राज्य के मध्य विधायी, प्रशासनिक व वित्तीय संबंध, तनाव क्षेत्र तथा सम्बन्ध को मजबूत बनाने हेतु आयोग व समिति के बारे में जानकारी दी गई है। 

केंद्र राज्य विधायी प्रशासनिक व वित्तीय संबंध

 संविधान के भाग 11 अनुच्छेद :- 245-255 ( विधायी संबंध )

 तथा अनुच्छेद :- 256-263 ( प्रशासनिक संबंध )

 भाग 12 अनुच्छेद :- 268- 293 ( वित्तीय संबंध )

 केंद्र राज्य विधायी प्रशासनिक व वित्तीय संबंध

केंद्र व राज्य के बीच में विधायी संबंध को हम निम्लिखित बिन्दुओं के आधार पर समझते है-

केंद्र एवं राज्य विधान के सीमांत क्षेत्र –

  • केन्द्रीय सरकार संपूर्ण भारत के क्षेत्र के लिए कानून बना सकती है।
  • राज्य राज्य के पूरे क्षेत्र या भाग के लिए कानून बना सकता  है ।
  • अतिरिक्त क्षेत्रीय विधान का अधिकार संसद के पास है।
  • संसद के कानून 4 केंद्र शासित प्रदेश पर लागू नहीं होते जो है – दमन एंड दिउ, अंडमान निकोबार, दादर नागर हवेली, लक्ष्यदीप। [राष्ट्रपति का  क्षेत्रीय अधिकार है ]
  • संसद अनुसूचित 5-6 में वर्णित क्षेत्र में कानून नहीं बना सकती [राष्ट्रपति का  क्षेत्रीय अधिकार है ]

विधायी विषयों का बँटवारा –

  • संघ सूची – वे विषय जिन पर नियम बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, इस सूची में शामिल है – रक्षा, बैंकिंग, विदेशी, मुद्रा ,आदि मूलतः 97 विषय
  • राज्य सूची – वे विषय जिन पर नियम बनाने का अधिकार राज्य  सरकार के पास है, इस सूची में शामिल है – पुलिस, स्थानीय स्वशासन, जन स्वास्थ्य, सार्वजनिक व्यवस्था, मूलतः 66 विषय
  • समवर्ती सूची – वे विषय जिन पर नियम बनाने का अधिकार संसद व राज्य  सरकार दोनों के पास है, परन्तु द्वंद्व की स्थिति में केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून लागु किया जाएगा, इस सूची में शामिल है – शिक्षा, वन्य जीव एवं पक्षी संरक्षण, कृषि आदि 
  • अवशिष्ट सूची – वे विषय जिन पर नियम बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, ये वो है विषयों जिनका उल्लेख तीनों सूची में नहीं है।

राज्य क्षेत्र में संसदीय विधान :-

संसद 5 परिस्थितियों में राज्य सूची के तहत विधि निर्माण कर सकते है-

  • अनुच्छेद 249,  राज्यसभा संसद को यह अधिकार दे सकती है।
  • राष्ट्रीय आपात-काल के समय।
  • अंतरराष्ट्रीय संधि या समझौते को लागू करने हेतु।
  • दो या दो से अधिक राज्य जब केंद्र से निवेदन करें  तब।
  • राष्ट्रपति शासन के समय।

  राज्य विधान-मंडल पर केंद्र का नियंत्रण :-

  • राजयपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु को भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति वीटो का प्रयोग कर सकता है।
  • वित्तीय आपात-काल के समय राज्य के धन विधेयक पर रोक लगाने हेतु केंद्र सरकार राज्य विधान मंडल को निर्देशित कर सकती है।
  • अनुच्छेद 265 (व्यापार एवं वाणिज्यकी स्वतंत्रता को प्रभावित करने संबंधित विधेयक ) के तहत लाये गए विधयेक को राष्ट्रपति की पूर्ण सहमति के पश्चात् ही लागु किया जा सकता है।

केंद्र राज्य विधायी प्रशासनिक व वित्तीय संबंध

केंद्र व राज्य के बीच में प्रशासनिक संबंध को हम निम्लिखित बिन्दुओं के आधार पर समझते है-

कार्यकारी शक्तियों का बँटवारा :-

  • केंद्र की कार्यकारी शक्ति पूरे भारत में विस्तृत है एवं राज्य की कार्यकारी शक्ति केवल राज्य क्षेत्र तक |
  • कुछ मामले जैसे समवर्ती सूची में उल्लेखित विधायी विषय में कार्यकारी शक्ति दोनों को प्राप्त है।

राज्य एवं केंद्र के दायित्व :-

संविधान में राज्य पर दो प्रतिबंध लगाए हैं जिससे केंद्र की  शक्ति में असीमित अधिकारों की वृद्धि होती है –

  • संसद द्वारा निर्मित किसी विधान का अनुपालन सुनिश्चित करना तथा राज्यों से संबंधित वर्तमान विधान
  • राज्य में केंद्र की शक्ति को बाधित या इसके संबंध में पूर्वाग्रह न रखना।

[नोट -अगर राज्य केंद्रीय निर्देशों के पालन में असफल होता है तो अनुच्छेद 365 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।] 

राज्यों को केंद्र के निर्देश :-

  • संचार के साधनों को बनाएं एवं रखरखाव।
  • रेलवे की सुरक्षा।
  • प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही प्रदान करें।
  • SC/ST कल्याण के लिए कार्य करना।
  • कार्यकारी अंतर सरकारी प्रतिनिधिमंडल का निर्माण जिसके तहत राष्ट्रपति केंद्र का कार्य राज्य को सौंप सकता है। [राज्य की सहमति ( सशर्त या बिना शर्त )] 

केंद्र व राज्यों के मध्य सहयोग :-

  • केंद्र व् राज्यों के मध्य सहयोग हेतु संविधान में अनुच्छेद 263 के तहत अन्तर्राज्यीय परिषद के गठन का प्रावधान है।
  • अनुच्छेद 262 के तहत नदी जल विवाद के लिए अन्तर्राज्यीय ट्रिब्यूनल का गठन करता है।
  • संसद अन्तर्राज्यीय व्यापार के प्रबंधन हेतु प्राधिकरण का गठन कर सकता है।

अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन :-

भारत में एकीकृत उच्च प्रशासनिक तंत्र की स्थापना हेतु, संविधान ने अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा को यह अधिकार दिया गया है की वो विधयेक लाकर नई अखिल भारतीय सेवा का सृजन कर सकती है ।

लोक सेवा आयोग :-

  • संसद दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग का गठन कर सकती है।
  • राज्यपाल के अनुरोध पर राष्ट्रपति यूपीएससी को राज्य में आवश्यकता अनुसार कार्य करती है।

एकीकृत न्यायपालिका :-

पारस्परिक टकराव एवं भ्रांतियों को दूर करने हेतु संसद विधान बना कर दो या दो से अधिक राज्यों का उच्च न्यायालय एक कर सकती है।

आपातकालीन उपबंध –

आपातकाल के समय केंद्र व राज्य वित्तीय सम्बन्ध के बारे में समस्त जानकारी हेतु आपातकालीन उपबंध पर क्लिक करें।

अन्य उपबंध –

  • राष्ट्रपति राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति करता है।
  • कई ऐसे पद जिनकी नियुक्ति तो राज्य सरकार की सलाह पर राजयपाल करते है, परन्तु उन्हें हटाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास होता है जैसे- राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति।

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केंद्र राज्य संबंध

केंद्र राज्य विधायी प्रशासनिक व वित्तीय संबंध

केंद्र व राज्य के बीच में वित्तीय सम्बन्ध को हम निम्लिखित बिन्दुओं के आधार पर समझते है-

कराधान शक्तियों का आवंटन –

  • संसद- संघ सूची, राज्य- राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है।
  • समवर्ती सूची पर संसद व् राज्य दोनों विधि का निर्माण कर सकते है, परन्तु द्वंद्व की स्थिति में केंद्र द्वारा बनाया गया कानून लागु होगा।
  • संसद उन विषयों पर भी कानून बना सकती है जिनका उल्लेख तीनों सूची में नहीं है (अवशिष्ट सूची)।

कर राजस्व का वितरण –

वित्त आयोग अपनी रिपोर्ट में कर एवं शुल्क का राज्य एवं केंद्र के समक्ष विभाजन की दर को बताता है। इस तरह वित्त आयोग केंद्र राज्य संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गैर कर राजस्व का वितरण –

केंद्र सरकार डाक, तार, रेलवे, बैंकिंग, प्रसारण, मुद्रा सिक्के, पेनल्टी, फाइन आदि आधारों पर राजस्व वसूल करता है।

राज्य सरकार वन, मत्स्य, सिंचाई, राज्य सार्वजनिक उपक्रम, पेनल्टी, फाइन आदि आधारों पर राजस्व वसूल करता है।

अनुदान –

केंद्र सरकार राज्य को दो प्रकार के सहायतार्थ अनुदान उपलब्ध कराते है –
विधिक अनुदान – अनुच्छेद 275 के तहत संसद, राज्य को आवश्यकता पड़ने पर अनुदान उपलब्ध कराए।
[नोट- सभी राज्यों को बराबर मिले, ऐसा जरूरी नहीं]
यह अनुदान केंद्र वित्त आयोग की अनुशंसा पर राज्यों को देता है।
विवेकाधीन अनुदान – अनुच्छेद 282 के तहत केंद्र के स्वविवेक द्वारा निति आयोग की सिफारिश पर राज्यों को मिलने वाला अनुदान, विवेकाधीन अनुदान है।

ऋण –

  • राज्य, केंद्र सरकार से या पडोसी राज्य से (देश के भीतर ही) संचित निधि की गारंटी पर ऋण ले सकता है।
  • जब राज्य किसी विदेशी शक्ति से ऋण लेता है तो केंद्र की स्वीकृति आवश्यक है, तथा उस समय केंद्र सरकार उत्तरदायी की भूमिका निभाती है।

परिसम्पत्तियाँ –

  • केन्द्रीय परिसम्पत्तियाँ राज्य के कर क्षेत्र से बाहर रहती है।
  • [नोट- केंद्र के निर्मित निगम या कम्पनियां कर मुक्त नहीं है]
  • तथा राज्य परिसम्पत्तियों को भी केंद्र के कर क्षेत्र से छुट प्राप्त है।

आपातकालीन उपबंध –

आपातकाल के समय केंद्र व राज्य वित्तीय सम्बन्ध के बारे में समस्त जानकारी हेतु आपातकालीन उपबंध पर क्लिक करें

 केंद्र व राज्य तनाव क्षेत्र :- 

1. राज्यपाल की नियुक्ति और बर्खास्तगी का तरीका

2. राष्ट्रपति शासन का पार्टी हित में प्रयोग

3. केंद्र का राज्य सूची के विषय में अतिक्रमण

4. संसद द्वारा राज्यों के मध्य वित्त विभाजन में भेदभाव

5. राज्य विधेयकों को राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति स्वीकृति हेतु भेजना

6. अखिल भारतीय सेवाएँ

7. आपातकालीन उपबंध आदि केंद्र राज्य तनाव क्षेत्र होते है।  

केंद्र राज्य विधायी प्रशासनिक व वित्तीय संबंध को मजबूत बनाने हेतु अनेक महत्वपूर्ण आयोग व समिति का गठन किया गया जो निम्नलिखित है –

1. प्रशासनिक सुधार आयोग

2. राजमन्नार समिति

3. सरकारिया आयोग

4. पुंछी आयोग आदि आयोग समिति का गठन केंद्र राज्य तनाव क्षेत्र को न्यून करने हेतु किया गया। 

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